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ये पाखंड नहीं, उसका निजी जीवन है

Posted On: 30 Mar, 2012 Others में

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मेरे पड़ोस में रहने वाले सुरेश वर्मा बहुत ही धार्मिक प्रवृति के इंसान है. कुछ साल पहले तक कृत्यानंद स्वामी (बदला हुआ नाम) के एक साउथ एक्ट्रेस के साथ अवैध संबंध का मामला मीडिया में आता देख वो सबसे ज्यादा परेशान हुए. क्योंकि वो तथाकथित स्वामीजी के परम भक्तों में से एक थे, उत्तर भारत में जहां भी स्वामी जी अपने सत्संग का तंबू लगाते. तो उसकी पहली पंक्ति में बैठकर वर्मा जी खुद स्वर्ग में होने की अनुभूति करते. लेकिन वर्मा जी के विश्वास ने उस दिन जब टीवी खोला तो अपने बाबा के निजी सबंधों को इस कदर टी.वी चैनल में लाल घेरे के बीच में देख कर भौचक्के रह गए. फिर क्या था, उन्होंने स्वामीजी के अन्य अनुयाइओं के साथ मिलकर अपनी आस्था के मातम को एक विरोध प्रर्दशन में हाय हाय के नारों के साथ जल चड़ाया. सिर्फ वर्मा जी ही नहीं बल्कि स्वामी जी के कई अनुयायी उस दिन आहत हुए .किसी ने अपने घर के मंदिर में रखी उनकी फोटो को कचरे के डब्बे में फेका तो किसी ने प्रर्दशन में भागीदारी दर्ज कराई. जब मैंने इस तरह के माहौल को अपने आसपास के लोगों में महसूस किया. तो अचानक मुझे सबसे पहले बहुत जोर से हंसी आई. फिर मैंने सोचा, कि इंसान को भगवान की पदवी देने वाले ये अनुयायी क्या अपने विश्वास के खुद ही हत्यारे नहीं है. किसी भी व्यक्ति के विचारों को पसंद करना और उन पर अंधा विश्वास करके खुद के विवेक को समर्पित कर देना दोनों ही अलग अलग चीजें है. और दुर्भाग्य है, कि अधिकतर लोग अपने विवेक को समर्पित करते है. अरे….. कोई भी व्यक्ति तो अपने विचारों से भीड़ जुआए या अनुयायी बनाए वो विचारवान हो सकता है. लेकिन भगवान नहीं, वो भी इंसानी व्यवाहर रखता है, किसी महिला या पुरूष की ओर आकर्षित होना, संसार और समाज के लोगों के बीच में आ जाकर कुछ इच्छाओं में लिप्त होना सामान्य बात है. सही और गलत हर तरह के काम वो भी कर सकता है. ऐसे में अगर हम लोग उसे पाखंडी या ढ़ोंगी कहें तो वो मेरी समझ से बिल्कुल सही नहीं है. अगर हम किसी के विचारों को समर्थन करते है, तो इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसे परमपिता बना लें. हमें ये सोचना चाहिए, कि कोई भी सतसंग करने वाले व्यक्ति सर्वशक्तिमान नहीं है. बल्कि वो आध्यात्म के विचारों का सौदागर है, जो कि उसका प्रोडक्ट है. जिससे हमें निजी जीवन में शांति देते है. हमें बस उस शांति और सुख को महसूस करना चाहीए. न कि उस व्यक्ति को भगवान समझकर मंदिर में विराजमान कर देना चाहिए.

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19 प्रतिक्रिया

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poghal के द्वारा
April 5, 2012

कौन है ये निर्मल बाबा, जो सरेआम जालसाजी कर रहा है? : कुछ और वाकये का जिक्र करना जरूरी समझ रहा हूं। बाबा कहते हैं कि पूजा में भावना होनी चाहिए, लेकिन जब बिहार की एक महिला को देखते ही उन्होंने कहाकि तुम छठ पूजा करती हो। वो बोली हां बाबा करती हूं, बाबा ने कहा कितने रुपये का सूप इस्तेमाल करती हो, वो बोली दस बारह रुपये का। बाबा ने कहा बताओ दस बारह रुपये के सूप से भला कृपा कैसे आएगी, तुम 30 रुपये का स…ूप इस्तेमाल करो। कृपा आनी शुरू हो जाएगी। बात यहीं खत्म नही हुई। एक महिला भक्त को उन्होंने पहले समागम में बताया था कि शिव मंदर में दर्शन करना और कुछ चढावा जरूर चढाना। अब दोबारा समागम में आई उस महिला ने कहा कि मैं मंदिर कई और चढावा भी चढाया, लेकिन मेरी दिक्कत दूर नहीं हुई। बाबा बोले कितना पैसा चढ़ाया, उसने कहा कि 10 रुपये, बाबा ने फिर हंसते हुए कहा कि दस रुपये में कृपा कहां मिलती है, अब की 40 रुपये चढाना देखना कृपा आनी शुरू हो जाएगी। अब देखिए इस महिला को बाबा ने ज्यादा पैसे चढाने का ज्ञान दिया, जबकि एक दूसरी महिला दिल्ली से उनके पास पहुंची, बाबा उसे देखते ही पहचान गए और पूछा शिव मंदिर में चढ़ावा चढ़ाया या नहीं। बोली हां बाबा चढा दिया। बाबा ने पूछा कितना चढ़ाया, वो बोली आपने 50 रुपये कहा था वो मैने चढ़ा दिया, और मंदिर परिसर में ही जो छोटे छोटे मंदिर थे, वहां दस पांच रुपये मैने चढ़ा दिया। बस बाबा को मौका मिल गया, बोले फिर कैसे कृपा आनी शुरू होगी, 50 कहा तो 50 ही चढ़ाना था ना, दूसरे मंदिर में क्यों चली गई। बस फिर जाओ.. और 50 ही चढ़ाना। क्या मुश्किल है, ज्यादा चढ़ा दो तो भी कृपा रुक जाती है, कम चढ़ाओ तो कृपा शुरू ही नहीं होती है। निर्मल बाबा ऐसा आप ही कर सकते हो, आपके चरणों में पूरे परिवार का कोटि कोटि प्रणाम। एक भक्त को बाबा ने भैरो बाबा का दर्शन करने को कहा। वो भक्त माता वैष्णों देवी पहुंचा और वहां देवी के दर्शन के बाद और ऊपर चढ़ाई करके बाबा भैरोनाथ का दर्शन कर आया। बाद में फिर बाबा के पास पहुंचा और बताया कि मैने भैरो बाबा के दर्शन कर लिए, लेकिन कृपा तो फिर भी शुरू नहीं हुई। बाबा ने पूछा कहां दर्शन किए, वो बोला माता वैष्णों देवी वाले भैरो बाबा का। बाबा ने कहा कि यही गड़बड़ है, तुम्हें तो दिल्ली वाले भैरो बाबा का दर्शन करना था। अब बताओ जिस बाबा ने कृपा रोक रखी है, उनके दर्शन ना करके, इधर उधर भटकते रहोगे तो कृपा कैसे चालू होगी। भक्त बेचारा खामोश हो गया। यहां मुझे एक कहानी याद आ रही है। एक आदमी बीबी से हर बात पर झगड़ा करता था। उसकी बीबी ने नाश्ते में एक दिन उबला अंडा दे दिया, तो पति ने बीबी को खूब गाली दी और कहा कि आमलेट खाने का मन था, और तुमने अंडे को उबाल दिया। अगले दिन बेचारी पत्नी ने अंडे का आमलेट बना दिया, तो फिर गाली सुनी। पति ने कहा आज तो उबला अंडा खाने का मन था। तुमने आमलेट बना दिया। तीसरे दिन बीबी ने सोचा एक अंडे को उबाल देती हूं और एक का आमलेट बना देती हू, इससे वो खुश हो जाएंगे। लेकिन नाश्ते के टेबिल पर बैठी पत्नी को उस दिन भी गाली सुननी पड़ी। पति बोला तुमसे कोई काम नहीं हो सकता, क्योंकि जिस अंडे को उबालना था, उसका तुमने आमलेट बना दिया और जिसका आमलेट बनाना था, उसे उबाल दिया। कहने का मतलब मैं नहीं समझाऊंगा। आप मुझे इतना बेवकूफ समझ रहे हैं क्या, कि निर्मल बाबा से सारे पंगे मैं ही लूंगा, कुछ चीजें आप अपने से भी तो समझ लो। बहरहाल दोस्तों तीसरी आंखे क्या क्या चीजें देखतीं है, मैं तो ज्यादा नहीं जानता। पर परेशान हाल आदमी से ये पूछा जाए कि आपने मटके का पानी कब पिया, भक्त कहे कि मटका तो बाबा मैने कब देखा याद ही नहीं, फिर बाबा बोले कि याद करो, भक्त कहता है कि हां कुछ याद आ रहा है कहीं प्याऊ पर रखा देखा था। बाबा कहते है कि हां यही बात मैं याद दिलाना चाहता था, आप प्याऊ पर एक मटका दान दे आओ और उस मटके पानी खुद भी पियो और दूसरों को भी पिलाओ। एक दूसरे भक्त को बाबा कहते हैं कि आप के सामने मुझे सांप क्यो दिखाई दे रहा है। भक्त घबरा गया, बोला बाबा सांप से तो मैं बहुत डरता हूं। बाबा बोले तुमने सांप कब देखा, भक्त ने कहा मुझे याद नहीं कब देखा। बाबा बोले याद करो, बहुत जोर डालने पर उसने कहा एक सपेरे के पास कुछ दिन पहले देखा था। बस बाबा को मिल गया हथियार, बोले कुछ पैसे दिए थे सपेरे को, भक्त ने कहा नहीं पैसे तो नहीं दिए। बस वहीं से कृपा रुक रही है। अगली बार सपेरे को देखो तो पैसे चढ़ा देना, कृपा आनी शुरू हो जाएगी। वैसे तो बाबा के किस्से खत्म होने वाले ही नहीं है, पर एक आखिरी किस्सा बताता हूं। एक भक्त को उन्होंने कहाकि आपके मन में बड़ी बड़ी इच्छाएं क्यों पैदा होती हैं ? बेचारा भक्त खामोश रहा। बाबा बोले आप कैसे चलते हो, साईकिल, बाइक या कार से। वो बोला बाइक से। इच्छा होती है ना बडी गाड़ी पर चलने की, उसने कहा हां, बस बाबा ने तपाक से कह दिया कि यही गलत इच्छा से कृपा रुकी है। आप बड़ी गाड़ी रास्ते पर देखना ही बंद कर दें। अब बताओ भाई कोई आदमी रास्ते पर है, अब बड़ी गाड़ी आ जाए तो बेचारा क्या करेगा। आंख तो बंद नहीं करेगा ना। इसीलिए कहता हूं कि मुझे तो लगता है कि बाबा के सामने मूर्खो की जमात लगती है । आप अगर उनके प्रश्न और सलाह सुन लें तो हँस-हँस कर लोटपोट हो जाएँ। hahahahaaaaaaaaaaaaaaKKKK

poghal के द्वारा
April 5, 2012

ढोंगी निर्मल बाबा से ऐसे निपटे- संता – “बाबा, मुझे रास्ता दिखाएँ मेरी शादी नहीं हो रही, बहुत चिंतित हूँ!” निर्मल बाबा – बेटा आप करते क्या हो?? संता – आप बताये शादी के लिए कौन सा काम उचित रहेगा?? … … निर्मल बाबा – तुम मिठाई की दूकान खोल लो! संता – बाबा वोह खोली हुई है, मेरे पिता की वोह दूकान है! निर्मल बाबा – शनिवार के दिन दूकान 9 बजे तक खोला करो! संता – शनी मंदिर के पास ही मेरी दूकान है जिस वजह से मैं देर रात तक दूकान खोला रहता हूँ! निर्मल बाबा – काले रंग के कुत्ते को मिठाई खिलाया करो! संता – मेरे घर में काले रंग का ही कुत्ता है जिसे मैं सुबह शाम मिठाई ही मिठाई खिलाता हूँ! निर्मल बाबा – सोमवार को शिव मंदिर जाया करो! संता – मैं केवल सोमवार नहीं, हर दिन शिव मंदिर जाता हूँ! निर्मल बाबा – भाई-बहन कितने है??? संता – बाबा, आपके हिसाब से शादी के लिए कितने भाई बहन होने चाहिए! निर्मल बाबा – दो भाई और एक बहन! संता – बाबा मेरे सच में दो भाई और एक बहन है! निर्मल बाबा – दान किया करो! संता – बाबा मैंने अनाथ-आश्रम खोल रखा है और उचित दान करता रहता हूँ! निर्मल बाबा – बद्रीनाथ कितनी बात गए हो? संता – बाबा, आपके हिसाब के शादी के लिए कितनी बार बद्रीनाथ जाना चाहिए??? निर्मल बाबा – कम से कम २ बार! संता – मैं भी दो बार ही गया हूँ! निर्मल बाबा – अच्छा, नीले रंग की शर्ट जाएदा पहना करो! संता – बाबा, पिछले चार साल से मैं नीले रंग की शर्ट पहन रहा हूँ कल ही धोले के लिए उतारी थी आज सूखते ही दुबारा पहन लूँगा, और कोई उपाए?? निर्मल बाबा – माँ-बाप की सेवा करते हूँ! संता – माँ बाप की इतनी सेवा की कि दोनों सीधे स्वर्ग चले गए!! बाबा एक सवाल पूछूं ?? निर्मल बाबा – हाँ, जरुर??? संता – बाबा, जरा ध्यान से देखिएगा कि मेरे माथे में सी लिखा हुया है??? निर्मल बाबा – नहीं! संता – तो बाबा, हो सकता है कि या तो आपके पास समय जाएदा है जो बैठ के लगे उल्लू बनाने या तो इन बैठे हुए सभी लोगो के पास पैसा ज्यादा है जो 3 – 3 हजार का टिकेट लेकर उल्लू बनने यहाँ आ गए?? वैसे एक बात और कह देता हूँ बाबा! निर्मल बाबा – हाँ क्या?? संता – मैं पहले से शादी शुदा हूँ और दो बच्चो का बाप भी! वोह तोह यहाँ से गुजर रहा था तोह सोचा थोडा टाइम पास आपसे करता चालू! हहाहहहहहाहा ……………

poghal के द्वारा
April 5, 2012

टीवी चल रहा था , माँ ने कहा बेटा बाबा के दर्शन कर ले , और बाबा कृपा बाँट रहे है , तू भी अपने लिए कुछ मांग ले , मेरा दिमाग चकरा गया , आखिर ये कौन सा खेल चल रहा है ? क्या टीवी पर देख कर अपना पर्स खोलने से पैसों की बरसात होने लगेगी ? क्या बिना कुछ किए सिर्फ बाबा के आशीर्वाद से सब काम हो जायेंगे ? और कल अचानक ही मैंने फेसबुक पर बाबा को लेकर बड़े आप्पत्तिजनक लेख पढ़े , तो सोचा बाबा और इस श्रद्धा / अन्धविश्वास पर आप लोगो की राय भी ली जाए :) फेसबुक पर युवराज सिंह की बीमारी को लेकर टिपण्णी की गयी थी , उसमे बताया गया था की कैसे बाबा ने युवराज की माँ शबनम सिंह से बीस लाख ठग लिए , युवराज की बीमारी को दूर करने के नाम पर , और अंत में युवराज के पापा ने बाबा का साथ छोड़ कर युवराज को डॉक्टर को दिखाया और उस का इलाज कराया , युवराज के पापा ने बताया की ढोंगी बाबा ने इलाज के नाम पर हर बार २० हजार रुपये फीस ली| और अंत तक रुपये बीस लाख उड़ गये उनके , जब उन्हें इस बात का पता चला तब तक बड़ी देर हो चुकी थी | युवराज सिंह के लुटते ही , हजारों जबान बाबा के विरूद्ध बोलने लगी , लेकिन इससे पहले बाबा ने ना जाने, कितने भक्तों को लूटा है , क्यूंकि बाबा का ये दरबार कई सालों से चलता आ रहा है , और आज निर्मल बाबा का “कारोबार” देश के हर हिस्से में अपना जाल बिछा चुका है , लोग झोली फैला कर खडें है , और अपनी मेहनत की कमाई बाबा की झोली में ड़ाल रहें है, लेकिन किसी ने बाबा का सच जान ने की कोशिश नहीं की | ये इस देश की परम्परा रही है , यहाँ लोग जल्दी से बाबाओं की बातों में आ जाते है , और बड़ी से बड़ी अपनी समस्या का इलाज वो उनसे करना चाहतें है , इस देश के लोगो को मुर्ख बनाना बेहद ही आसन है , और जब से मिडिया का दखल बड़ा है, इनके झांसे में बड़े बड़े विद्वान , पढ़े लिखे लोग भी आने लगे है | आज कल लगभग हर चेनल पर बाबाओं का दौर चल रहा है , हर चेनल अन्धविश्वास को बढ़ावा दे रहा है , कहने को तो हम विकसित देश बनने की और कदम बढ़ा रहें है , लेकिन आज भी हम उसी रुढ़िवादी मानसिकता में जी रहें है , जहां आज भी कैंसर , एड्स का इलाज झाडे फूकें से होता है , आज भी लड़के लड़की की शादी कुंडली , गुण मिला कर की जाती है , और फिर भी शादियाँ कितनी सफल होती है वो भगवान या बाबा ही जाने :) लोग अपना भविष्य जाने के लिए , अपना हाथ लिए खड़े रहेते है , घंटों लाइनों में , कुछ हमारी मानसिकता ऐसी हो गयी है , की हमे सब कुछ चाहिये , लेकिन हम करना कुछ नहीं चाहते | ना जाने इस देश में कितने बाबा आयें लोगो की आस्था से खेलें और चलें गयें , कुछ दिन भक्त उदास होतें है , और फिर कोई बाबा आता है उन्हें पुचकारता है और छल कर चला जाता है , और ये आस्था अन्धविश्वास का दौर चलता रहता है | मुझे निर्मल बाबा से कोई ऐतराज नहीं है , लेकिन मै चाहता हूँ की बाबा अपनी कमाई का ब्यौरा सार्वजानिक करें , यदि वो जनता की भलाई का कार्य कर रहें है , तो गरीबों को सही दिशा दिखाएँ , और अपने कमाए गये रुपयों से जनता का भला करें ना की उस पैसों को अपने ऐशो आराम पर या अपने भक्तों की भोग विलासिता पर खर्च करें | आप यदि जन सेवा की भावना ले कर चल पड़े है तो फिर आप को पैसों की इतनी लालसा क्यूँ है? यदि आप किसी का भला कर सकतें है , ऐसी को दिव्यशक्ति आप के पास है तो क्यूँ ना खुले दिल से और खुले मन से खुले प्रागण में और एक दम परिदार्श्किता के साथ काम करें ? ना की अपने भक्तों को टोपी पहनाने का काम | मुझे गीता का शलोक याद आता है “कर्म करे जा फल की इच्छा ना कर रे इंसान” , और “जो भी होता है अच्छे के लिए होता है , तो यदि आप लोगो के साथ कुछ बुरा भी हो रहा है तो उसके पीछे कुछ कारण होगा , किसी बाबा के कहने या करने से आप के दिन बदल नहीं जायेंगे , जो लिखा है वो भोगना ही होगा | सो कृपया आँखें खुली रखें और अपने आप को ठगने ना दें | श्रद्धा को अन्धविश्वास का रूप ना लेने दे |

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 1, 2012

आज की परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हो गयीं कि आदमी सोचने पर मजबूर हो जाता है, किस पर विश्वास करें किस पर न करें.

drmalayjha के द्वारा
April 1, 2012

हम जब किसी के विचारों से प्रभावित होते हैं तो उसे पहले अपना आदर्श फिर भगवान मान लेते हैं. ये उसका नहीं हमारा दोष है. कोई भी इंसान भगवान् नहीं हो सकता, ना ही सर्वथा दोषमुक्त. तो फिर किसी की कोई भी कमजोरी उजागर होने पर इतनी हाय-तौबा होनी ही नहीं चाहिए. जस्ट रिलेक्स यार. आपकी अभिव्यक्ति अच्छी लगी.

follyofawiseman के द्वारा
April 1, 2012

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Sumit के द्वारा
April 1, 2012

सुंदर रचना मगर ……हम किसी के बारे में जाने बिना, मात्र उसकी बातें सुनके उसे बहुत कुछ मान लेते है आखिर क्यों ???? http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/03/22/आखिर-क्यों/

March 31, 2012

आपने निचे कि पंक्तियों में सटीक बाते रखी हैं. परन्तु ऊपर का घटना क्रम हकीकत से मेल नहीं खाता कारण यह है कि बाबा के बारे में जानने के बाद भी लोगों की उनपर से विश्वास नहीं उठता क्योंकि उनकी भक्ति स्वयं उस बाबा से स्वार्थ वश होती हैं…….और जहाँ स्वार्थ पूर्ण होने की भ्रान्ति हो वहां क्या सच हैं और क्या झूठ लोगों को समझ में नहीं आता…जहाँ तक रहा सच्चा गुरु क्या हैं उस पर जल्दी ही विचार प्रकट करूँगा. उसके लिए एक महीने कम से कम इंतजार करिए……..बधाई के पात्र…आपके विचारों में थोडा और चिंतन और विश्लेषण की जरुरत हैं कोशिश करिए….. आप इससे भी बेहतर कर सकती है….हां एक बात कहूँगा जो भी कहिये सोच समझकर कहिये ताकि उसके लिए आपको शर्मिंदा न होना परे . कटु हो पर वह सिर्फ बुरे के लिए हो व्यक्ति के लिए नहीं. वरना आपमें और मान-मर्यादा वालों में कोई अंतर नहीं रह जायेगा……

pawansrivastava के द्वारा
March 31, 2012

रश्मी जी, चुंकि आप तहज़ीब की ज़बर्दस्त तलबगार हैं ,आदाब से भी ज़यादा तहज़ीबदार लफ़्ज़ अगर कोई है तो वो अर्ज़ है आपको.आपने जिस संदीप जी को घटिया और छिछोरा कहा है,वैसी बेबाकी और पोशिदगी अगर सब अपने दिल मे ले आयें तो यकीन मानिये इस जहां का काया-कल्प हो जाए….काश आपके दनिश्गी में वो पैनापन होता,आपके जज़्बातों में वो बारीकी होती तो आप संदीप जी के लिखे शब्दों का मतलब समझ पातीं….आपको जो बेलौस,बेतरीब,बेअदबी से भरे उनके अल्फ़ाज़ दिख रहे हैं,उनके दबीज़ सतहों को तोडकर तो देखिये,संदर शफ़कत का समन्दर दिखेगा आपको…संदीप जी ने कोई बेअदबी नहीं की है ….हां गलती उन्होने ज़रूर की है,आपके अहम को ठेस पहूंचाने की ….वही हिमाकत मैं भी कर रहा हूं….मुझपे भी ’छिछोरा’ या ’घटिया’ जैसा कोई विशेषण नवाज़ दिजियेगा ….आपके लिये अपनी लिखी दो कवितायें भेज रहा हूं,हो सके तो कोशिश किजियेगा उन्हें समझने की….आपका शुभेच्छू -पवन श्रीवस्तव. 1) एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है वो पागल है कि चांद को महबूबा नहीं कहता है वो पागल है कि भीड की भाषा से जुदा रहता है दिन को दिन कहता है रात को रात कहता है देखिये पागल को, कैसी बहकी बात कहता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है दुनियां आती है जब तहज़ीबों का चोला पहनाने फ़ेंक के काबा-ए-तकल्लुफ़ वो नंग रहता है नफ़ासत की तलवारों से कटते सिर देख के, जाहिल उज्जड वो बडा दंग रहता है सिर गिनता है वो मकतूलों के, कातिलों के खंज़र गिनता है देखिये पागल वो दुनियां के कैसे मंज़र बिनता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है वो पागल है कि उसकी ज़ुबां में तल्खियत है सच्चाई की , तंज़ बहुत है; वो अहमक है जो नहीं जानता कि इस दुनियां में सच्चों से लोगों को रंज़ बहुत है; झूठ की लानत-मलामत करता है वो सच की खुशामद करता है, देखिये कैसा पागल है वो कि न अदा-ए-बनावट करता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है 2) चलो पाबंदियों के कैंचुल उतार थोडा हल्के हो लें और पुरकैफ़ हवाओं में हम आज़ाद डोलें उडें मरज़ी के आसमान में हम इधर-उधर चलो बेफ़िक्री के आलम में थोडा खो लें; इस अदब और तहज़ीब की दुनियां में है हीं क्या, झूठी मुस्कराहट,नकली सलाम और अनमनी दुआ; परम्पराओं के परकोटे हैं, मज़हब की सददें हैं, बंदिशें हैं,बेडियां हैं और मुल्कों की सरहदें हैं; चलो अब हर दिवार गिरा दें और बंदिशों की हर बेडियां काटें चलो अब हर अदना-ओ-आला में सुख-दुख बराबर बांटें अब प्यास को चुनने दें प्याला हम और रिंद को मैकदा चुनने दें, अब ज़ुबां को चुनने दें तकल्लुम हम और होठों को तबस्सुम चुनने दें अब आंखों को चुनने दें मंज़र हम और ज़िस्म को कबा चुनने दें, अब रियाज़त को चुनने दें मसीहा हम और ज़ुर्म को सज़ा चुनने दें; चलो पाबंदियों के कैंचुल उतार थोडा हल्के हो लें और पुरकैफ़ हवाओं में हम आज़ाद डोलें;

    rashmikhati के द्वारा
    April 1, 2012

    aapse es ajjeb vwahar ki umeed nai thi

chaatak के द्वारा
March 31, 2012

रश्मि जी, आपके विचारों से पूर्ण सहमति महसूस करता हूँ| हमें अपने ऊपर और अपनी आस्था पर विश्वास होना चाहिए किसी को भगवान् कहना या ढोंगी कहना दोनों एक जैसी चीज़ें है दोनों ही दशाओं में हम साधारण, सरल सत्य को नकार रहे होते हैं जो कदापि उचित नहीं है! अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई!

    rashmikhati के द्वारा
    April 1, 2012

    dhanyawaad

sadhna के द्वारा
March 31, 2012

रश्मि जी मैं समझती हूँ कि जब एक इंसान किसी दुसरे इंसान को गुरु या महान मानने लगता है तो उसकी उस गुरु से कुछ उम्मीदें हो जाती हैं ऐसे में वह गुरु कुछ भी गलत या सही करता है तो उसके मानने वालों को उसी के अनुसार बुरा या अच्छा लगता है! किसी भी रिश्ते का उदहारण लेकर समझ सकते हैं इस बात को…. फिर जिसे आपने गुरु माना है वो आम इंसान नहीं रह जाता…. यदि गुरु हमे सही गलत में फर्क करना सिखाता है तो हम उससे किसी भी गलत काम की उम्मीद नहीं कर सकते!

    rashmikhati के द्वारा
    March 31, 2012

    sadhnaa g reply ke liye dhanyawaad lekin..mere kehne ka arth hain ki hum aise yug main hain jaha kudrati taur se koi bhi insaan ishwar ke nikat nai hain.. aadhyatam ab eshwar ko paane ke liye nai balki apne dimaag ki shanti ke liye grahan kiya jaata hain behtar hain hum un wachano ko samete .. naa ki wachan dene waale vyakti ko bhagwaan banaye

prateekraj के द्वारा
March 31, 2012

well said.. he is also a persona with desires but we must also remember that people like him declare or atleast say so,not to involve with any kind of pleasure but when they do so,it’s against their oath. apart from that,you are right,it’s their life.let’s just take the good from him and let him live his life

    prateekraj के द्वारा
    March 31, 2012

    person*

    rashmikhati के द्वारा
    March 31, 2012

    thanks for ur reply… but again i wanna say same thing .. that mythologically we should earn rather that we make that person our lord

alankarmaurya के द्वारा
March 30, 2012

यह गुरु ही है जो परमात्मा से मिलने का रास्ता दिखता है. उसके प्रति पूर्ण समर्पण आवश्यक है. यह गुरु नहीं है… यह ढोंगी बाबा है… इसमें भक्तो का दोष नहीं है…

    rashmikhati के द्वारा
    March 31, 2012

    dhnyawaad alank jee… lekin sampuran sampran ka matlab ye nai ki hum uske vichaaro ki tulnaa uske niji jiwan ki jarurato se nai karni chaheye


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