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एक सिगरेट और कैरेक्टर सर्टिफिकेट

Posted On: 25 Mar, 2012 में

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कभी कभार एक कप चाय पर हुई 4 मिनट 30 सेकेंड की हल्की बातचीत भी बहुत गहरा अनुभव छोड़ जाती है. ऐसा ही कुछ मेरे साथ उस दिन हुआ, जब मैं अपने ही कलीग के साथ ऑफिस के पास की दुकान पर चाय पीने शाम को निकली. मेरे ये साथी पत्रकार भले ही मेरे बहुत करीब लोगों में से न हो, लेकिन उनके खुले अंदाज में कही हुई एक बात ने एक गहरा प्रश्न मेरे जहन में छोड़ दिया.चाय पीने के साथ ही सिगरेट का कश मारते हुए कहा कि क्या तुम भी सिगरेट पीती हो मैं अभी जवाब देने की भूमिका बांध ही रही थी, कि उन्होंने हंसते हुए कहा, तुम कहां पीती होगी तुम उस तरह की लगती नहीं हो. और मैंने अपना जवाब देने से पहले ही अपने शब्दों को खुद के भीतर दबा लिया. मैं रात भर ये सोचती रही कि क्या कुछ इंचो की सिगरेट किसी लड़की के पीने से उसका चरित्र चित्रण कर सकती है. यहां पर मैं लड़कियों के सिगरेट पीने की पैरवी नहीं कर रही, बस इतना कहना चाहती हूं. कि,ये कैसा दोहरे मापदंडों वाला समाज है. जो कि एक पुरूष के एब को उसका स्टेटस सिंबल या फिर मर्दों में छिपा एक केवल एक एब मानता है. बल्कि वही अगर कोई लड़की इसे पीती है, तो उसे चरित्रहीन और ओछी मानसिकता से देख जाता है. इसके पीछे लॉजिक क्या है, ये मुझे आज तक कोई नहीं बता पाया. लेकिन जब मैंने खुद मैं इस सवाल की खोजा, तो मुझे खुद से सिर्फ एक ही जवाब मिला कि हम एक ऐसे समाज मैं पैदा हुई लड़कियां है. जहां लड़कियों की छवि को शीशे सामन बनाया गया है. जिसमें जरा सी धूल भी लोगों की आखों में खटकती है. जबकि इस समाज का पुरूष लोहे के सरिये के समान है. जिसे हर तरह की परिस्थितीयों में ठोस ही माना जाता है. इज्जत चाहे अपने घर की हो, मुहल्ले की या फिर पूरे गांव की इसका पूरा दारोमदार उस लड़की के कंधों पर डाल दिया जाता है. जो एक असल आम इंसान ही है, अच्छी और बुरी आदतें उसमें भी हो सकती है. लेकिन पुरूष अपने घर, मुहल्ले, गांव का ऐसा शख्स है. जो हजार गलतियां कर लें लेकिन उन्हें छिपाने के लिए उसका पुरूष होना ही काफी है. हम लड़कियां आज भले ही पतंग की तरह जितना मर्जी आसमां की ऊचांईयों को छू रही हो ,लेकिन हकीकत यही है, कि अंत में हमारी डोर या तो खींच दी जाती है. या फिर कटकर आसमां से लड़खड़ाती हुई जमीं पर आ गिरती है.

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rahul Parcha के द्वारा
March 26, 2012

जिस समाज में लड़किओं को लडकियो की नज़र से बचाने के लिए अपना सिर झुका कर चलना पड़ता हो उस से आप कितनी उम्मीद रख सकती हैं…. खैर सुंदर लेखनी को साधुवाद.. http://rahulparcha.jagranjunction.com/2012/03/26/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%87-%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B6%E0%A4%BE/

Jamuna के द्वारा
March 26, 2012

आपका अनुभव बहुत ही शानदार है. रश्मि जी प्रतिक्रिया का जवाब तो दे दीजिए. http://jamuna.jagranjunction.com/

Sumit के द्वारा
March 25, 2012

सुंदर लेख….मैं अब क्या कहू …..आपने कुछ कहने लायक नहीं छोड़ा ……. http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/03/22/आखिर-क्यों/

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 25, 2012

रश्मि जी मैं आपकी बातों पर सहमत हूँ. चाहें स्त्री हो या पुरुष दोनों के लिए बुराई तो बुराई है. लेकिन समाज का क्या किया जाये. यहाँ सभी दूसरों के ही घर में झांकते हैं, अपने अन्दर कितनी गन्दगी है यह कोई नहीं देखना चाहता.

vikasporwal के द्वारा
March 25, 2012

नमस्कार रश्मि जी,बिलकुल सही कह रहीं हैं आप, सदियाँ बदल गयीं, सत्ताएं बदल गयीं, लेकिन इतने प्रगतिवादी युग में जीने के बाद भी महिला -पुरुष के चरित्र के परख के पैमाने आज भी बेहद लचर हैं, पहले तो सिगरेट पीना ही गलत है, चाहे पुरुष हो या स्त्री ,फिर भी यदि इसमें अंतर किया जाता है तो यह हमारे समाज का सबसे बिगड़ा रूप है I http://vikasporwal.jagranjunction.com/wp-admin/index.php

vikasporwal के द्वारा
March 25, 2012

नमस्कार रश्मि जी,बिलकुल सही कह रहीं हैं आप, सदियाँ बदल गयीं, सत्ताएं बदल गयीं, लेकिन इतने प्रगतिवादी युग में जीने के बाद भी महिला -पुरुष के चरित्र के परख के पैमाने आज भी बेहद लचर हैं, पहले तो सिगरेट पीना ही गलत है, चाहे पुरुष हो या स्त्री ,फिर भी यदि इसमें अंतर किया जाता है तो यह हमारे समाज का सबसे बिगड़ा रूप है I

dhananjaynautiyal के द्वारा
March 25, 2012

आपकी बात बिलकुल सही है …”यह दोहरे मापदंडों वाला समाज है.” ….”यहाँ इज्जत चाहे अपने घर की हो, मुहल्ले की या फिर पूरे गांव की इसका पूरा दारोमदार उस लड़की के कंधों पर डाल दिया जाता है. ” क्यों नहीं समाज का हर व्यक्ति इस तरह से सोचता है कि बुराई किसी भी व्यक्ति (पुरुष अथवा महिला) के भीतर मौजूद हो बुराई से निजात पाना ही है | और किसी भी बुराई का समर्थन सिर्फ इस लिए नहीं हो क्योंकि वह पुरुष में निहित है | यही सोच बदल जाए तो समाज में अनेक बुराई समाप्त हो जाएँ लेकिन … क्या सोच बदल पायेगी ?

dineshaastik के द्वारा
March 25, 2012

बहुत ही सटीक एवं सार्थक प्रश्न, जिसका उत्तर तार्किक उत्तर मुझे भी आज तक नहीं मिला… http://dineshaastik.jagranjunction.com/author/dineshaastik/


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