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आखिर कब दम तोड़ेगी हैवानियत?

Posted On: 20 Mar, 2012 में

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समाज बदल रहा है, लोग बदल रहे है. अब लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं
है.जो एक का हक है, वही दूसरे का अधिकार है. आज दुनिया के हर क्षेत्र में
लड़कियां लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है. अब महिला आजाद और
सशक्त है. लेकिन ऐसी मेरी ऐसी विचारधारा पर उस दिन विराम लग गया, जब होली
से एक रात पहले पांच साल की मासूम कविता (बदला हुआ नाम) के साथ ४० साल के
मुन्ना सिंह ने वहशीपन की सारी सीमाएं लांग दी. पहले तो उस शैतान ने उस
मासूम को अधमरा होने तक उसे अपनी हवस का शिकार बनाया. और आखिर में उसे
कूड़े का ढेर समझकर उसके घर के दरवाजे पर छोड़ दिया. घबराए मां बाप उसे
अस्पताल ले गए. एक चमत्कारी ऑपरेशन ने उस बच्ची को बचा तो लिया. लेकिन
उसके बाद न ही वो हसंती नही रोती न ही कोई इच्छा जाहिर करती. बस एक टक
देखती और रात को जब भी उसे अपने साथ हुए उसे हादसे की याद आती तो सिसकती
रहती. शायद ये उस मासूम कविता के लिए अब उसके स्त्री लिंग होने का सबसे
बढ़ा अपराध था. कुछ दिन तक ये पूरा वाक्या हर अखबारों के क्राइम पेज का
ब्रेड बटर बन कर बिका, लेकिन तीन दिन के बाद आबारों में दूसरी हेडिंग लग
गई और उस लड़की के आसपास सन्नाटा छा गया. बस रह गए, तो उसके मजबूर मां
बाप. जो कभी अपनी बच्ची की अधमरी हालत में आंसू बहाते, तो कभी खुद को एक
बच्ची के माता पिता होने पर कोसते. अब शायद आप लोग सोच रहे होंगे मैं एक
बार फिर लड़कियों के अधिकार और सुरक्षा के ऊपर सवाल खड़े करूंगी, या फिर
लोगों में लड़कियों के प्रति दबे वहशीपन पर छिछालेदार लिखूंगी. लेकिन ऐसा
नहीं है. इस बार मेरे मन मैं बस एक ही सवाल है. जो उस रोज से बाद बार बार
उठ रहा है. कि आखिर कब तक इस तरह की मासूम लड़कियों को मिडीया हेडलाइन और
लोक अपना शोक जाहिर करने का विषय समझेंगे. इस पूरे वाक्ये में एक बार भी
किसी व्यक्ति ने उस दरिंदे की हैवानियत और उसे पहचानने की जिज्ञासा क्यों
जाहिर नहीं की? किसी ाी आदमी ने उस शैतान पर कभी न भुला पाने वाला दंड
देने की मांग क्यों नहीं है. कुछ सालों की सजा काट कर वो वहशी फिर से सड़क
पर सीना चौड़ा कर घूमेगा. लेकिन वो मासूम जो अब बिस्तर पर जिंदा लाश की
तरह वक्त गुजार रही है. क्या वो कभी अपने अंधेरे भविष्य को आगे ले जा
पाएंगी? तो जवाब है, कभी नहीं. वो मासूम जिसे ये तक नहीं पता था, जीते जी
बार बार मौत से टकराना किसे कहते है, वो एक अगर आप उसे बच्ची को देते तो
शायद खुद ही महसूस कर लेंगे. इस पूरे हादसे ने जहां एक तरफ मुझे झंझोर के
रख दिया, वही दूसरी ओर कभी न मिटने वाला ऐसा प्रश्न एक बार फिर मेरे जहन
में छोड़ दिया है. कि आखिर कब इन वहशियों को इनके किए की ऐसी  खौफनाक सजा
दी जाएगी. जिसे सुनकर किसी के अंदर भी हैवान जन्म लेने से पहले मौत की
कामना करें.

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shaktisingh के द्वारा
March 23, 2012

रश्मि जी, आपका लेख सार्थक, सटीक और यथार्थ है. न जाने कब यह दरिंदगी मौत में तबदील होगी

prateekraj के द्वारा
March 23, 2012

अच्छा लगा आपने is समस्या पर किसी के कुछ न करने पर अपने विचार प्रकट किये. जो लोग इन समस्याओं को समझते है, उन्हें अपना मानते हैं वो ही इनको दूर कर सकते हैं. मुझे और भी अच्छा लगेगा ये जानकार की आप इसके विषय में लिखने के साथ साथ कुछ और भी कदम उठा रही हैं.

Harish Bhatt के द्वारा
March 22, 2012

रश्मि जी नमस्ते. सार्थक लेख के साथ जागरण जंक्शन पर आने के लिए हार्दिक बधाई.

dineshaastik के द्वारा
March 21, 2012

रश्मि जी मंच पर आपका स्वागत है। आपकी प्रथम मार्मिक रचना ने इतना अधिक दृवित कर दिया कि अश्कों की बाहुल्यता की वजह से इसे एक बार में पढ़ना संभव नही ंहो सका। क्या आपको नहीं लगता है कि इस तरह की घटना को अंजाम देने वालों की अमानवीय यातनायें दी जाय। उन्हें उनके सारे अधिकारों से तुरंत ही वंचित कर दिया जाय। यहाँ तक की समाज से आजीवन प्रथक कर दिया जाय। अर्थात पाशविक जीवन जीने के लिये विवश कर दिया जाय। यही उत्तम एवं आदर्श व्यव्यथा हो सकती है। http://dineshaastik.jagranjunction.com/author/dineshaastik/

akraktale के द्वारा
March 20, 2012

अवश्य ही चिंतनीय विषय है.सिर्फ क़ानून के सहारे नहीं निपटा जा सकता समाज को आगे आना होगा तभी कुछ हद तक अच्छे परिणाम आ पायेंगे.

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 20, 2012

आज समाज में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की जो भी घटनाएँ घट रहीं हैं, यह हमारे समाज की विकृत मानसिकता को दर्शाती है. इसे मानसिक विकृति नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे कि एक बुजुर्ग कामांध होकर एक छोटी बच्ची से दुराचार करता है. इसमें बच्ची का क्या दोष? हमारा सामाजिक ताना-बना ही ऐसा हो गया है. हैवानियत और दरिंदगी बढ़ गयी है. समाज विकृत होता चला जा रहा है. कहने को तो शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है, ज्ञान का स्तर बढ़ रहा है. मनुष्य प्रगति कर रहा है. यह प्रगति नहीं हो रही है. यह विध्वंश का संकेत दे रहा है. इसीलिए मैं कहता हूँ की हमारे पुरखे निरक्षर जरुर थे,अज्ञानी नहीं थे. आज शिक्षा है परन्तु ज्ञान नहीं है. हमारा समाज पाश्चात्य से प्रभावित है. आप उनके आवरण को ओढ़ कर चलते हैं तो आधुनिक हैं,प्रगतिशील हैं, अन्यथा आपको मूर्ख की उपाधि दे दी जाती है. इस आधुनिकता ने ही समाज में विकृति पैदा कर दी है. http://ajaydubeydeoria.jagranjunction.com


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