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rashmikhati


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ये कितने हेल्दी गरीब है…

Posted On: 9 Apr, 2012  
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वो सुकून शायद फिर न मिलें

Posted On: 2 Apr, 2012  
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ये पाखंड नहीं, उसका निजी जीवन है

Posted On: 30 Mar, 2012  
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इस तरह के पुरूषों को आप क्या कहेंगे?

Posted On: 28 Mar, 2012  
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एक सिगरेट और कैरेक्टर सर्टिफिकेट

Posted On: 25 Mar, 2012  
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आखिर कब दम तोड़ेगी हैवानियत?

Posted On: 20 Mar, 2012  
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Hello world!

Posted On: 26 Feb, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: rashmikhati rashmikhati

के द्वारा: rashmikhati rashmikhati

के द्वारा: rashmikhati rashmikhati

के द्वारा: rashmikhati rashmikhati

के द्वारा: Jayprakash Mishra Jayprakash Mishra

कौन है ये निर्मल बाबा, जो सरेआम जालसाजी कर रहा है? : कुछ और वाकये का जिक्र करना जरूरी समझ रहा हूं। बाबा कहते हैं कि पूजा में भावना होनी चाहिए, लेकिन जब बिहार की एक महिला को देखते ही उन्होंने कहाकि तुम छठ पूजा करती हो। वो बोली हां बाबा करती हूं, बाबा ने कहा कितने रुपये का सूप इस्तेमाल करती हो, वो बोली दस बारह रुपये का। बाबा ने कहा बताओ दस बारह रुपये के सूप से भला कृपा कैसे आएगी, तुम 30 रुपये का स...ूप इस्तेमाल करो। कृपा आनी शुरू हो जाएगी। बात यहीं खत्म नही हुई। एक महिला भक्त को उन्होंने पहले समागम में बताया था कि शिव मंदर में दर्शन करना और कुछ चढावा जरूर चढाना। अब दोबारा समागम में आई उस महिला ने कहा कि मैं मंदिर कई और चढावा भी चढाया, लेकिन मेरी दिक्कत दूर नहीं हुई। बाबा बोले कितना पैसा चढ़ाया, उसने कहा कि 10 रुपये, बाबा ने फिर हंसते हुए कहा कि दस रुपये में कृपा कहां मिलती है, अब की 40 रुपये चढाना देखना कृपा आनी शुरू हो जाएगी। अब देखिए इस महिला को बाबा ने ज्यादा पैसे चढाने का ज्ञान दिया, जबकि एक दूसरी महिला दिल्ली से उनके पास पहुंची, बाबा उसे देखते ही पहचान गए और पूछा शिव मंदिर में चढ़ावा चढ़ाया या नहीं। बोली हां बाबा चढा दिया। बाबा ने पूछा कितना चढ़ाया, वो बोली आपने 50 रुपये कहा था वो मैने चढ़ा दिया, और मंदिर परिसर में ही जो छोटे छोटे मंदिर थे, वहां दस पांच रुपये मैने चढ़ा दिया। बस बाबा को मौका मिल गया, बोले फिर कैसे कृपा आनी शुरू होगी, 50 कहा तो 50 ही चढ़ाना था ना, दूसरे मंदिर में क्यों चली गई। बस फिर जाओ.. और 50 ही चढ़ाना। क्या मुश्किल है, ज्यादा चढ़ा दो तो भी कृपा रुक जाती है, कम चढ़ाओ तो कृपा शुरू ही नहीं होती है। निर्मल बाबा ऐसा आप ही कर सकते हो, आपके चरणों में पूरे परिवार का कोटि कोटि प्रणाम। एक भक्त को बाबा ने भैरो बाबा का दर्शन करने को कहा। वो भक्त माता वैष्णों देवी पहुंचा और वहां देवी के दर्शन के बाद और ऊपर चढ़ाई करके बाबा भैरोनाथ का दर्शन कर आया। बाद में फिर बाबा के पास पहुंचा और बताया कि मैने भैरो बाबा के दर्शन कर लिए, लेकिन कृपा तो फिर भी शुरू नहीं हुई। बाबा ने पूछा कहां दर्शन किए, वो बोला माता वैष्णों देवी वाले भैरो बाबा का। बाबा ने कहा कि यही गड़बड़ है, तुम्हें तो दिल्ली वाले भैरो बाबा का दर्शन करना था। अब बताओ जिस बाबा ने कृपा रोक रखी है, उनके दर्शन ना करके, इधर उधर भटकते रहोगे तो कृपा कैसे चालू होगी। भक्त बेचारा खामोश हो गया। यहां मुझे एक कहानी याद आ रही है। एक आदमी बीबी से हर बात पर झगड़ा करता था। उसकी बीबी ने नाश्ते में एक दिन उबला अंडा दे दिया, तो पति ने बीबी को खूब गाली दी और कहा कि आमलेट खाने का मन था, और तुमने अंडे को उबाल दिया। अगले दिन बेचारी पत्नी ने अंडे का आमलेट बना दिया, तो फिर गाली सुनी। पति ने कहा आज तो उबला अंडा खाने का मन था। तुमने आमलेट बना दिया। तीसरे दिन बीबी ने सोचा एक अंडे को उबाल देती हूं और एक का आमलेट बना देती हू, इससे वो खुश हो जाएंगे। लेकिन नाश्ते के टेबिल पर बैठी पत्नी को उस दिन भी गाली सुननी पड़ी। पति बोला तुमसे कोई काम नहीं हो सकता, क्योंकि जिस अंडे को उबालना था, उसका तुमने आमलेट बना दिया और जिसका आमलेट बनाना था, उसे उबाल दिया। कहने का मतलब मैं नहीं समझाऊंगा। आप मुझे इतना बेवकूफ समझ रहे हैं क्या, कि निर्मल बाबा से सारे पंगे मैं ही लूंगा, कुछ चीजें आप अपने से भी तो समझ लो। बहरहाल दोस्तों तीसरी आंखे क्या क्या चीजें देखतीं है, मैं तो ज्यादा नहीं जानता। पर परेशान हाल आदमी से ये पूछा जाए कि आपने मटके का पानी कब पिया, भक्त कहे कि मटका तो बाबा मैने कब देखा याद ही नहीं, फिर बाबा बोले कि याद करो, भक्त कहता है कि हां कुछ याद आ रहा है कहीं प्याऊ पर रखा देखा था। बाबा कहते है कि हां यही बात मैं याद दिलाना चाहता था, आप प्याऊ पर एक मटका दान दे आओ और उस मटके पानी खुद भी पियो और दूसरों को भी पिलाओ। एक दूसरे भक्त को बाबा कहते हैं कि आप के सामने मुझे सांप क्यो दिखाई दे रहा है। भक्त घबरा गया, बोला बाबा सांप से तो मैं बहुत डरता हूं। बाबा बोले तुमने सांप कब देखा, भक्त ने कहा मुझे याद नहीं कब देखा। बाबा बोले याद करो, बहुत जोर डालने पर उसने कहा एक सपेरे के पास कुछ दिन पहले देखा था। बस बाबा को मिल गया हथियार, बोले कुछ पैसे दिए थे सपेरे को, भक्त ने कहा नहीं पैसे तो नहीं दिए। बस वहीं से कृपा रुक रही है। अगली बार सपेरे को देखो तो पैसे चढ़ा देना, कृपा आनी शुरू हो जाएगी। वैसे तो बाबा के किस्से खत्म होने वाले ही नहीं है, पर एक आखिरी किस्सा बताता हूं। एक भक्त को उन्होंने कहाकि आपके मन में बड़ी बड़ी इच्छाएं क्यों पैदा होती हैं ? बेचारा भक्त खामोश रहा। बाबा बोले आप कैसे चलते हो, साईकिल, बाइक या कार से। वो बोला बाइक से। इच्छा होती है ना बडी गाड़ी पर चलने की, उसने कहा हां, बस बाबा ने तपाक से कह दिया कि यही गलत इच्छा से कृपा रुकी है। आप बड़ी गाड़ी रास्ते पर देखना ही बंद कर दें। अब बताओ भाई कोई आदमी रास्ते पर है, अब बड़ी गाड़ी आ जाए तो बेचारा क्या करेगा। आंख तो बंद नहीं करेगा ना। इसीलिए कहता हूं कि मुझे तो लगता है कि बाबा के सामने मूर्खो की जमात लगती है । आप अगर उनके प्रश्न और सलाह सुन लें तो हँस-हँस कर लोटपोट हो जाएँ। hahahahaaaaaaaaaaaaaaKKKK

के द्वारा: poghal poghal

ढोंगी निर्मल बाबा से ऐसे निपटे- संता - "बाबा, मुझे रास्ता दिखाएँ मेरी शादी नहीं हो रही, बहुत चिंतित हूँ!" निर्मल बाबा - बेटा आप करते क्या हो?? संता - आप बताये शादी के लिए कौन सा काम उचित रहेगा?? ... ... निर्मल बाबा - तुम मिठाई की दूकान खोल लो! संता - बाबा वोह खोली हुई है, मेरे पिता की वोह दूकान है! निर्मल बाबा - शनिवार के दिन दूकान 9 बजे तक खोला करो! संता - शनी मंदिर के पास ही मेरी दूकान है जिस वजह से मैं देर रात तक दूकान खोला रहता हूँ! निर्मल बाबा - काले रंग के कुत्ते को मिठाई खिलाया करो! संता - मेरे घर में काले रंग का ही कुत्ता है जिसे मैं सुबह शाम मिठाई ही मिठाई खिलाता हूँ! निर्मल बाबा - सोमवार को शिव मंदिर जाया करो! संता - मैं केवल सोमवार नहीं, हर दिन शिव मंदिर जाता हूँ! निर्मल बाबा - भाई-बहन कितने है??? संता - बाबा, आपके हिसाब से शादी के लिए कितने भाई बहन होने चाहिए! निर्मल बाबा - दो भाई और एक बहन! संता - बाबा मेरे सच में दो भाई और एक बहन है! निर्मल बाबा - दान किया करो! संता - बाबा मैंने अनाथ-आश्रम खोल रखा है और उचित दान करता रहता हूँ! निर्मल बाबा - बद्रीनाथ कितनी बात गए हो? संता - बाबा, आपके हिसाब के शादी के लिए कितनी बार बद्रीनाथ जाना चाहिए??? निर्मल बाबा - कम से कम २ बार! संता - मैं भी दो बार ही गया हूँ! निर्मल बाबा - अच्छा, नीले रंग की शर्ट जाएदा पहना करो! संता - बाबा, पिछले चार साल से मैं नीले रंग की शर्ट पहन रहा हूँ कल ही धोले के लिए उतारी थी आज सूखते ही दुबारा पहन लूँगा, और कोई उपाए?? निर्मल बाबा - माँ-बाप की सेवा करते हूँ! संता - माँ बाप की इतनी सेवा की कि दोनों सीधे स्वर्ग चले गए!! बाबा एक सवाल पूछूं ?? निर्मल बाबा - हाँ, जरुर??? संता - बाबा, जरा ध्यान से देखिएगा कि मेरे माथे में सी लिखा हुया है??? निर्मल बाबा - नहीं! संता - तो बाबा, हो सकता है कि या तो आपके पास समय जाएदा है जो बैठ के लगे उल्लू बनाने या तो इन बैठे हुए सभी लोगो के पास पैसा ज्यादा है जो 3 - 3 हजार का टिकेट लेकर उल्लू बनने यहाँ आ गए?? वैसे एक बात और कह देता हूँ बाबा! निर्मल बाबा - हाँ क्या?? संता - मैं पहले से शादी शुदा हूँ और दो बच्चो का बाप भी! वोह तोह यहाँ से गुजर रहा था तोह सोचा थोडा टाइम पास आपसे करता चालू! हहाहहहहहाहा ...............

के द्वारा: poghal poghal

टीवी चल रहा था , माँ ने कहा बेटा बाबा के दर्शन कर ले , और बाबा कृपा बाँट रहे है , तू भी अपने लिए कुछ मांग ले , मेरा दिमाग चकरा गया , आखिर ये कौन सा खेल चल रहा है ? क्या टीवी पर देख कर अपना पर्स खोलने से पैसों की बरसात होने लगेगी ? क्या बिना कुछ किए सिर्फ बाबा के आशीर्वाद से सब काम हो जायेंगे ? और कल अचानक ही मैंने फेसबुक पर बाबा को लेकर बड़े आप्पत्तिजनक लेख पढ़े , तो सोचा बाबा और इस श्रद्धा / अन्धविश्वास पर आप लोगो की राय भी ली जाए :) फेसबुक पर युवराज सिंह की बीमारी को लेकर टिपण्णी की गयी थी , उसमे बताया गया था की कैसे बाबा ने युवराज की माँ शबनम सिंह से बीस लाख ठग लिए , युवराज की बीमारी को दूर करने के नाम पर , और अंत में युवराज के पापा ने बाबा का साथ छोड़ कर युवराज को डॉक्टर को दिखाया और उस का इलाज कराया , युवराज के पापा ने बताया की ढोंगी बाबा ने इलाज के नाम पर हर बार २० हजार रुपये फीस ली| और अंत तक रुपये बीस लाख उड़ गये उनके , जब उन्हें इस बात का पता चला तब तक बड़ी देर हो चुकी थी | युवराज सिंह के लुटते ही , हजारों जबान बाबा के विरूद्ध बोलने लगी , लेकिन इससे पहले बाबा ने ना जाने, कितने भक्तों को लूटा है , क्यूंकि बाबा का ये दरबार कई सालों से चलता आ रहा है , और आज निर्मल बाबा का “कारोबार” देश के हर हिस्से में अपना जाल बिछा चुका है , लोग झोली फैला कर खडें है , और अपनी मेहनत की कमाई बाबा की झोली में ड़ाल रहें है, लेकिन किसी ने बाबा का सच जान ने की कोशिश नहीं की | ये इस देश की परम्परा रही है , यहाँ लोग जल्दी से बाबाओं की बातों में आ जाते है , और बड़ी से बड़ी अपनी समस्या का इलाज वो उनसे करना चाहतें है , इस देश के लोगो को मुर्ख बनाना बेहद ही आसन है , और जब से मिडिया का दखल बड़ा है, इनके झांसे में बड़े बड़े विद्वान , पढ़े लिखे लोग भी आने लगे है | आज कल लगभग हर चेनल पर बाबाओं का दौर चल रहा है , हर चेनल अन्धविश्वास को बढ़ावा दे रहा है , कहने को तो हम विकसित देश बनने की और कदम बढ़ा रहें है , लेकिन आज भी हम उसी रुढ़िवादी मानसिकता में जी रहें है , जहां आज भी कैंसर , एड्स का इलाज झाडे फूकें से होता है , आज भी लड़के लड़की की शादी कुंडली , गुण मिला कर की जाती है , और फिर भी शादियाँ कितनी सफल होती है वो भगवान या बाबा ही जाने :) लोग अपना भविष्य जाने के लिए , अपना हाथ लिए खड़े रहेते है , घंटों लाइनों में , कुछ हमारी मानसिकता ऐसी हो गयी है , की हमे सब कुछ चाहिये , लेकिन हम करना कुछ नहीं चाहते | ना जाने इस देश में कितने बाबा आयें लोगो की आस्था से खेलें और चलें गयें , कुछ दिन भक्त उदास होतें है , और फिर कोई बाबा आता है उन्हें पुचकारता है और छल कर चला जाता है , और ये आस्था अन्धविश्वास का दौर चलता रहता है | मुझे निर्मल बाबा से कोई ऐतराज नहीं है , लेकिन मै चाहता हूँ की बाबा अपनी कमाई का ब्यौरा सार्वजानिक करें , यदि वो जनता की भलाई का कार्य कर रहें है , तो गरीबों को सही दिशा दिखाएँ , और अपने कमाए गये रुपयों से जनता का भला करें ना की उस पैसों को अपने ऐशो आराम पर या अपने भक्तों की भोग विलासिता पर खर्च करें | आप यदि जन सेवा की भावना ले कर चल पड़े है तो फिर आप को पैसों की इतनी लालसा क्यूँ है? यदि आप किसी का भला कर सकतें है , ऐसी को दिव्यशक्ति आप के पास है तो क्यूँ ना खुले दिल से और खुले मन से खुले प्रागण में और एक दम परिदार्श्किता के साथ काम करें ? ना की अपने भक्तों को टोपी पहनाने का काम | मुझे गीता का शलोक याद आता है “कर्म करे जा फल की इच्छा ना कर रे इंसान” , और “जो भी होता है अच्छे के लिए होता है , तो यदि आप लोगो के साथ कुछ बुरा भी हो रहा है तो उसके पीछे कुछ कारण होगा , किसी बाबा के कहने या करने से आप के दिन बदल नहीं जायेंगे , जो लिखा है वो भोगना ही होगा | सो कृपया आँखें खुली रखें और अपने आप को ठगने ना दें | श्रद्धा को अन्धविश्वास का रूप ना लेने दे |

के द्वारा: poghal poghal

यह कहा गया है की प्यार में कभी गिरना नहीं चाहिय , प्यार उठने का नाम है , प्यार इक ख़ामोशी है सुनती है सहा करती है , तो प्यार पाने में है यह सच है , और पाना वह सच्चाई है की आप बस उसे ही सोचते हैं , तो फिर किस बात का पाना , अपने उसे पा तो लिया , आप खुशनसीब है की आपने उस सच्चे प्यार को महशुस किया , भगवन ने आपको किस्मत वाला बनाया है ,देखिये कैसे दूर रहकर ये प्यार मह्शूश होता है ना साथ रहना पाना नहीं है छलावा है , भगवन ने आपको उसे प्यार से मिलवाया , अपने जरुर कहा होगा की वाह भगवन , अब जब उसी भगवन अलग कर रहा है तो आप उसे बुरा कह रहे हैं , भगवन जो करता है अच्छा करता है , आप किसी को दुःख दिखाओगे तो दुनिया बस आपका मजाक उडायगी, देखा है ना आपने देवदास का हाल , आज तक तो उसे लोग नाकाम मानते हैं अरे उदहारण बनो उठो और सम्मान से जियो, जीवन इक पथ है कभी पतझड़ कभी सावन , मिलो औरो से, देखो मन खोलकर सारा जन्हा ख़ूबसूरत है , अरे सामना करो और निकलो इस दर्द से जो बेकार है , देखो कितना करने को है ,

के द्वारा: चन्दन राय चन्दन राय

के द्वारा: rashmikhati rashmikhati

के द्वारा: rashmikhati rashmikhati

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आपने निचे कि पंक्तियों में सटीक बाते रखी हैं. परन्तु ऊपर का घटना क्रम हकीकत से मेल नहीं खाता कारण यह है कि बाबा के बारे में जानने के बाद भी लोगों की उनपर से विश्वास नहीं उठता क्योंकि उनकी भक्ति स्वयं उस बाबा से स्वार्थ वश होती हैं.......और जहाँ स्वार्थ पूर्ण होने की भ्रान्ति हो वहां क्या सच हैं और क्या झूठ लोगों को समझ में नहीं आता...जहाँ तक रहा सच्चा गुरु क्या हैं उस पर जल्दी ही विचार प्रकट करूँगा. उसके लिए एक महीने कम से कम इंतजार करिए........बधाई के पात्र...आपके विचारों में थोडा और चिंतन और विश्लेषण की जरुरत हैं कोशिश करिए..... आप इससे भी बेहतर कर सकती है....हां एक बात कहूँगा जो भी कहिये सोच समझकर कहिये ताकि उसके लिए आपको शर्मिंदा न होना परे . कटु हो पर वह सिर्फ बुरे के लिए हो व्यक्ति के लिए नहीं. वरना आपमें और मान-मर्यादा वालों में कोई अंतर नहीं रह जायेगा......

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आप खुद को समझा लीजिये. किसी दुसरे को आप क्या समझायेंगे और क्या समझेंगे आप. आज जो समाज का स्वरुप विकसित हुआ है उसका विरोध मैं भी करता हूँ. परन्तु इसका दोषी सबसे अधिक आप जैसे विचार धारा के लोग है. दो व्यक्तियों को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार हमारा भगवान, धर्म और इश्वर सभी देते है. परन्तु आप जैसे लोग उस पर अंकुश लगाकर या तो रिश्ता तोड़ने की कोशिश करते है या फिर उन्हें गलत साबित करने की कोशिश करते हैं. ऐसे में चोरी छुपे वो चीज कर जाते जो उन्हें नहीं करना चाहिए. दुनिया का कोई भी धर्म हो यह स्पष्ट कहता है कि एक लड़की की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी करना गुनाह है तो फिर आप इसे परंपरा कैसे बना लिए......यदि विरोध करना हैं तो बुराई का करिए. छिछोरा पंती और अश्लीलता का विरोध मैं भी करता हूँ.....पर आप जैसे लोग धर्म और परंपरा के नाम पर जो कर रहे है वो उससे भी गिरा हुआ काम है.....यदि नियंत्रित करना है तो अपने मन को करिए.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

रश्मी जी, चुंकि आप तहज़ीब की ज़बर्दस्त तलबगार हैं ,आदाब से भी ज़यादा तहज़ीबदार लफ़्ज़ अगर कोई है तो वो अर्ज़ है आपको.आपने जिस संदीप जी को घटिया और छिछोरा कहा है,वैसी बेबाकी और पोशिदगी अगर सब अपने दिल मे ले आयें तो यकीन मानिये इस जहां का काया-कल्प हो जाए….काश आपके दनिश्गी में वो पैनापन होता,आपके जज़्बातों में वो बारीकी होती तो आप संदीप जी के लिखे शब्दों का मतलब समझ पातीं….आपको जो बेलौस,बेतरीब,बेअदबी से भरे उनके अल्फ़ाज़ दिख रहे हैं,उनके दबीज़ सतहों को तोडकर तो देखिये,संदर शफ़कत का समन्दर दिखेगा आपको…संदीप जी ने कोई बेअदबी नहीं की है ….हां गलती उन्होने ज़रूर की है,आपके अहम को ठेस पहूंचाने की ….वही हिमाकत मैं भी कर रहा हूं….मुझपे भी ’छिछोरा’ या ’घटिया’ जैसा कोई विशेषण नवाज़ दिजियेगा ….आपके लिये अपनी लिखी दो कवितायें भेज रहा हूं,हो सके तो कोशिश किजियेगा उन्हें समझने की….आपका शुभेच्छू -पवन श्रीवस्तव. 1) एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है वो पागल है कि चांद को महबूबा नहीं कहता है वो पागल है कि भीड की भाषा से जुदा रहता है दिन को दिन कहता है रात को रात कहता है देखिये पागल को, कैसी बहकी बात कहता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है दुनियां आती है जब तहज़ीबों का चोला पहनाने फ़ेंक के काबा-ए-तकल्लुफ़ वो नंग रहता है नफ़ासत की तलवारों से कटते सिर देख के, जाहिल उज्जड वो बडा दंग रहता है सिर गिनता है वो मकतूलों के, कातिलों के खंज़र गिनता है देखिये पागल वो दुनियां के कैसे मंज़र बिनता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है वो पागल है कि उसकी ज़ुबां में तल्खियत है सच्चाई की , तंज़ बहुत है; वो अहमक है जो नहीं जानता कि इस दुनियां में सच्चों से लोगों को रंज़ बहुत है; झूठ की लानत-मलामत करता है वो सच की खुशामद करता है, देखिये कैसा पागल है वो कि न अदा-ए-बनावट करता है एक पागल जाने किस अज़ब से आलम में रहता है खुदा को अदना कहता है और खुद को खुदा कहता है 2) चलो पाबंदियों के कैंचुल उतार थोडा हल्के हो लें और पुरकैफ़ हवाओं में हम आज़ाद डोलें उडें मरज़ी के आसमान में हम इधर-उधर चलो बेफ़िक्री के आलम में थोडा खो लें; इस अदब और तहज़ीब की दुनियां में है हीं क्या, झूठी मुस्कराहट,नकली सलाम और अनमनी दुआ; परम्पराओं के परकोटे हैं, मज़हब की सददें हैं, बंदिशें हैं,बेडियां हैं और मुल्कों की सरहदें हैं; चलो अब हर दिवार गिरा दें और बंदिशों की हर बेडियां काटें चलो अब हर अदना-ओ-आला में सुख-दुख बराबर बांटें अब प्यास को चुनने दें प्याला हम और रिंद को मैकदा चुनने दें, अब ज़ुबां को चुनने दें तकल्लुम हम और होठों को तबस्सुम चुनने दें अब आंखों को चुनने दें मंज़र हम और ज़िस्म को कबा चुनने दें, अब रियाज़त को चुनने दें मसीहा हम और ज़ुर्म को सज़ा चुनने दें; चलो पाबंदियों के कैंचुल उतार थोडा हल्के हो लें और पुरकैफ़ हवाओं में हम आज़ाद डोलें;

के द्वारा: pawansrivastava pawansrivastava

हां मैं समझ रहा हूं कि अगर मैं उन लम्पट पुरुषों की तरह बोलूं तो रूढीवादी नही कहलाउंगा. पर वास्तव मे किसी को समझाया नही जा सकता. और कुछ लडकियों तो कतइ नही.. इसलिए कहते हैं मूर्खता सबसे बड़ा अपराध है. और आज के लम्पट मीडिया के बनाए झूठे समज को ही पूरी दुनिया समझने वालों को समझाना भी असंभव है कि जो धर्म समाज आपने देखा ही नहीं है वो किस किताब मे लिखा है. मतलब आज की महिला खुद को चठ चालाक समझ मनमानी करे तो वही स्वीकार कर लिया जाए. बहुत बढिया. आज के लडके ओर खासकर लडकियां खुद ही दुस्साहस करती हैं और उन्हे उसमे भी समर्थन चाहिए.. सीमा लांघने वाली ऎसी लडकियों तो कड़ी सजा मिलनी चाहिए. पर सही है आपको अभी तक लम्पट पुरुष ही मिले होंगो. और अपनी मनमानी को ही धर्म समाज संस्क्रिति समझने वालोंकी संख्या बढ गइ है और जिसे लंपंटता फैलाने वाले मीडिया से बढावा मिल रहा हैऔर हिंदी फिल्मो को जीवन मे उतारने की चाह रखने वालों को उसकी स्वीकार्यता भी चाहिए. ये अफसोस नाक है. फिल्मी दुनिया को धर्म मनने वालों को कोइ क्या बताएगा कि किस सभ्यता,युग, किताब मे क्या लिखा है . यहा कमेंट करना आपको आगाह करना था. अधिक कुछ नहीं। सही समय आएगा तो आप सही नियम पालन भी देखेंगे. तब तक आनंदकरें.. स्वतंत्रता का आनंद ले. और ये व्यक्तिगत आक्षेप नहीं है. धन्यवाद. 

के द्वारा: shailesh001 shailesh001

के द्वारा: prateekraj prateekraj

बड़े मजे की बात है आज की ये तथाकथित आघुनिक नारी खुद ही अतिदुस्साहस दिखाती है आज मीडिया की बनाई काल्पनिक कहानी का खुद को नायिका समझती है, परिवार के खिलाफ जाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती है और जब मनमानी नहीं चलती तो इस तरीके से अजीबोगरीब व्यवहार करती है. बहुत सारी भ्रांतियां लड़कियों को दूरकरनी हैं..वो फिर कभी,        पर एक औसत लडका बिल्कुल ऐसे ही करता है.. समाज परिवार से विमुख रहने वाली ऐसे ही हल्के तौर पर देखी जाती हैं , पारंपरिक रीति से आई लडकी ही पत्नी के रूप में स्वीकार करता है.. और यही सही भी है . पर आज आसमान पर उड़ने वाली आधुनिकाएं कुख सुनना समझना नहीं चाहतीं . पर दूसरो को दोष देने मे पीछे नही नहना चाहतीं.. और ऐसी बेवकूफी के लिए कोइ सहानूभूति नही हो सकती.. हो सकता आपको ये बात कडवी लगे... पर हजारों सालों के नियमों का कुछ अर्थ तो होगा ही. और है। 

के द्वारा: shailesh001 shailesh001

आपकी सहेली की आप बीती और हमारे कुछ ब्लोगर भाइयों की प्रतिक्रिया पढ़ी. आपने जो सवाल किया है उसका जवाब तो देना नहीं चाहूँगा. यदि आप मुझसे जवाब चाहती है तो वह मेरे लेखों और कृतियों में मिल जायेगा. परन्तु जो भाई लोग यह बोल रहें है कि आपकी सहेली में हिम्मत नहीं कि उसके मुंह पर दो चांटा मारे या थूक दे. एक समय के लिए उनसे कहूँगा कि एक बार आप उस लड़की के जगह पर खुद को रखकर सोचिये. आपका जिसके साथ अफेयर हो ओर वो बोले कि मेरे साथ फिर से रिश्ता कायम करों नहीं तो तुम्हारे पति और उसके घरवालों के बता देंगे तो इस स्थिति में आप क्या करेंगे. यदि मान लीजिये कि आप खुद अपने पति को जाकर बता देते तो अब आप उस औरत के पति की जगह खुद को रखकर बताएं कि अपनी पत्नी के बारे में इतना सब सुनकर आप उसे पहले की भांति मान-सम्मान, प्यार दे पाएंगे. अब आप उस औरत की मज़बूरी को को समझ सकते है जो सामाजिक बन्धनों के साथ घिरी हुई है , हरेक जगह उसको खुद को बचाना ही पड़ता है. आइये एक औरत की मज़बूरी को एक उदहारण से समझा जाये.......छुरी चाहें खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर. हरेक हाल में कटना तो.................! क्या समझे.... जय हो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की जहाँ लोग एक तरफ औरत को देवी और माँ की संज्ञा देते है और दूसरी तरफ वास्तविक जीवन में...................हां......हां.....हां.....! मजा आया......! तो एक बार प्रेम से बोलिए भारत माता की .......जय! भारतीय संस्कृति की.......जय!........बस-बस अब हमारा देश ओर हमारी संस्कृति महान हो गयी ................अब हम सभी स्वतंत्र है अपनी माँ-बहनों को ....................................जय हो, जय जय हो

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

प्यार कोई आसान सा खेल नहीं है जिसे कुछ देर खेलकर बाद में बंद किया जा सके.अगर आपकी उस मित्र को इतनी बड़ी कमिटमेंट में पढने से पहले समझदारी से काम लेना चाहिए था. जो लोग गलत होते हैं,उन्हें पहचान कर उनसे बचना ही सही है. अगर आप उन्हें न पहचानने की गलती करेंगे तो फिर खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा. अब जबकि उनके साथ ऐसा हो ही गया है तो फिर वो अब उस आदमी को अपने पास क्यूँ आने दे रही हैं.अगर वो चाहता भी है तो क्या आपकी दोस्त में इतनी हिम्मत नहीं है जो वो उसे न कह पाए.वो उस आदमी की जागीर नहीं हो सकती की जैसा चाहे वैसा व्यवहार करे.पर प्यार में गलत इंसान को चुनने पर गलती हमारी भी होती है. अब आपको चाहिए की आप अपनी दोस्त को समझाएं. all the best.

के द्वारा: prateekraj prateekraj

आज समाज में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की जो भी घटनाएँ घट रहीं हैं, यह हमारे समाज की विकृत मानसिकता को दर्शाती है. इसे मानसिक विकृति नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे कि एक बुजुर्ग कामांध होकर एक छोटी बच्ची से दुराचार करता है. इसमें बच्ची का क्या दोष? हमारा सामाजिक ताना-बना ही ऐसा हो गया है. हैवानियत और दरिंदगी बढ़ गयी है. समाज विकृत होता चला जा रहा है. कहने को तो शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है, ज्ञान का स्तर बढ़ रहा है. मनुष्य प्रगति कर रहा है. यह प्रगति नहीं हो रही है. यह विध्वंश का संकेत दे रहा है. इसीलिए मैं कहता हूँ की हमारे पुरखे निरक्षर जरुर थे,अज्ञानी नहीं थे. आज शिक्षा है परन्तु ज्ञान नहीं है. हमारा समाज पाश्चात्य से प्रभावित है. आप उनके आवरण को ओढ़ कर चलते हैं तो आधुनिक हैं,प्रगतिशील हैं, अन्यथा आपको मूर्ख की उपाधि दे दी जाती है. इस आधुनिकता ने ही समाज में विकृति पैदा कर दी है. http://ajaydubeydeoria.jagranjunction.com

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria




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